Saturday, 19 August 2017

सनातन धर्म को जाने क्या हे ब्राम्हण

सावधान !!
       कभी भी वेदवेत्ता  ब्राह्मणों का अपमान् न करें , कभी भी उन्हें दोषदृष्टि से नहीं देखें , मन से भी उनके विरूद्ध न विचार करें । क्योंकि इस पृथ्वी पर साक्षात् भगवान्  विष्णु इनके ही रूप में विचरण कर रहें हैं ।
इनके ब्राह्मतेज से तो तेज के अधिष्ठान अग्नि को भी कष्ट में पडना पडा , जिनके तेज से अथाह गंभीर महार्णव समुद्र को भी खारा हो जाना पडा , उनके ही रूप से द्वेष करके कहाँ जाओगे ।
ब्राह्मणों का ये ही मर्यादा है कि अपने से कोई भी श्रेष्ठ विद्या , तप , या वयोवृद्ध हो , उसको सम्मान दे । और अपनेे को उनके समक्ष अतिन्यून समझें ।
ये ब्राह्मणों के साथ ब्राह्मणों की मर्यादा है । अन्य वर्णों का तो कहना ही नहीं है ।
जो ब्राह्मण व्रत और तपस्या से अपनेे शरीर को तपाते हैं , वेदाध्ययन करते हैं , संतोषवृत्ति से प्राय: रहना चाहते हैं , उनसे द्वेष , हा धिक् ॥ 
ब्राह्मण चाहे दुर्वासा के जैसे हों या वशिष्ठ सदृश ,देवगुरू बृहस्पति के जैसे हों या जडभरत जैसा , सर्वदा ब्रह्म के पर्याय हैं ।
॥ ॐ तत्सत् ब्रम्हार्पणमस्तु ।।

Friday, 18 August 2017

प्रश्न - मनुष्य की पूजा की जा सकती है या नहीं ?

उत्तर -  अवश्य  की जा सकती है ,  कोई मनुष्य अपने से श्रेष्ठ है , तो उसकी पूजा अवश्य करनी चाहिये ।  हमारी  सनातन वैदिक परम्परा  है कि अपने से ज्येष्ठ, श्रेष्ठ  , वरिष्ठों, अतिथियों  का पूजन   आसन, अर्घ्य, पाद्य, पत्र, पुष्प, फल , जलादि माध्यमेन  किया जाता है । इसीलिए  श्री भगवान्  इस प्रकार की मनुष्यपूजा को  शारीरिक  तप कहते हैं,  देखें  -

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ।। [ श्रीमद्भगवद्गीता १७/१४ ]

एवमेव मनु ने भी कहा है -

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।। [ मनुस्मृतिः २/१२१]

प्रश्न २ - सन्त की पूजा करनी चाहिए  या नहीं ?

उत्तर  - अवश्य  करनी चाहिए ,  श्री भगवान् आद्य शंकराचार्य  कहते हैं कि क्योंकि विद्वान् सत्यसङ्कल्प होता है , इसलिये सत्यसङ्कल्प होने के कारण वह पूजनीय ही है, -

तस्माद्विदुषः सत्यसङ्कल्पत्वाद्........पूजार्ह एवासौ ।।
[शाङ्करभाष्यम् , मु०उप०३/१/१०]

एवमेव श्रीभगवत्पाद् ने अन्यत्र भी यही  अनुश्रुति  कही है कि जो पुरुष तीनों स्थानों में बतलाई गयी तुल्यता अथवा समानता को निश्चयपूर्वक जानता है , वह महामुनि समस्त प्राणियों का पूजनीय और वन्दनीय होता है  -

त्रिषु धामसु यस्तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितः ।
स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ।।
[ माण्डूक्योपनिषद् ,अ०प्र०गौ०का० -२२]

अतः आचार्य ऐसे सन्तों की पूजा एवं वन्दना को अभिहित करते हुए कहते हैं -

यथोक्तस्थानत्रये यस्तुल्यमुक्तं सामान्यं वेत्त्येवमेवैतदिति निश्चितो  यः स पूज्यो वन्द्यश्च ब्रह्मविल्लोके भवति ।
[ शाङ्करभाष्यम्, माण्डूक्योपनिषद् ,अ०प्र०गौ०का० -२२]

प्रश्न ३ - भौतिक कामनाऐं लेकर सन्त की पूजा  की जा सकती है या नहीं ?

उत्तर  - अवश्य  की जा सकती है।  सकामभावना से की गयी सन्त की पूजा से वे कामनाऐं पूरी  होती हैं ।

मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है  कि  जिसको इस लोक का यश और सुख-सुविधा चाहिए , वह  ज्ञानवान् का पूजन करे अथवा  मृत्यु  के बाद किसी ऊँचे लोक में जाना हो तब भी  सन्त की पूजा करे , जैसा कि  -

//वह विशुद्धचित्त आत्मवेत्ता मन से जिस-जिस लोक की भावना करता है और जिन-जिन भोगों को चाहता है, वह उसी-उसी लोक और उन्हीं-उन्हीं भोगों को प्राप्त कर लेता है। इसलिए ऐश्वर्य की इच्छा करने वाला पुरुष आत्मज्ञानी की पूजा करे ।//

यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान्।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः।।
[ मुण्डकोपनिषद् ३।१।१०]

जब भौतिक कामनाएं सन्तों की पूजा से पूर्ण होती हैं , तो आध्यात्मिक कामनाओं का तो कहना ही क्या ,  जैसा कि महामुनि पतञ्जलि    योगदर्शन , समाधिपाद के ३७ वें सूत्र में कहते हैं कि  रागरहित चित्त का विषय करने से  चित्त को एकाग्रता की प्राप्ति होती है -

वीतरागविषयं वा चित्तम्  । [ योगदर्शनम् १/३७]

वीतराग त्यागात्मा  योगियों का चित्त रागरहित होता है , ऐसे  अनासक्त महात्माओं के विरक्त चित्त का ध्यान करने से  चित्त एकाग्र होता है , जिनका चित्त एकाग्र होता है , वही अपने जीवन में  उत्कृष्ट  आध्यात्मिक लक्ष्य  को  प्राप्त  करते हैं ।

।। जय श्री  राम ।।              

Thursday, 17 August 2017

मेरे गुरुदेव उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री: स्वरूपानन्द सरस्वतीजी महाराज का परिचय एवम् मेरे जीवन का श्रेष्ठ समय विशाल जोषी

सरस्वतीशंकराचार्य स्वामीस्वरूपानंद सरस्वतीमहाराज (जन्म: २ सितम्बर १९२४) एकहिन्दूअध्यात्मिक गुरु,स्वतन्त्रता सेनानीहैं।

[1]जीवन परिचयस्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का जन्म २ सितम्बर १९२४ को मध्य प्रदेश राज्य केसिवनीजिले मेंजबलपुरके पास दिघोरी गांव मेंब्राह्मणपरिवार में पिता श्री धनपति उपाध्याय और मां श्रीमती गिरिजा देवी के यहां हुआ। माता-पिता ने इनका नाम पोथीराम उपाध्याय रखा। नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ कर धर्म यात्रायें प्रारम्भ कर दी थीं। इस दौरान वहकाशीपहुंचे और यहांउन्होंने ब्रह्मलीन श्रीस्वामी करपात्री महाराजवेद-वेदांग, शास्त्रों की शिक्षा ली। यह वह समय था जबभारतकोअंग्रेजोंसे मुक्त करवाने की लड़ाई चल रही थी। जब १९४२ में अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा तो वह भी स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और १९ साल की उम्र में वह 'क्रांतिकारी साधु' के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसी दौरान उन्होंनेवाराणसीकी जेल में नौ औरमध्यप्रदेशकी जेलमें छह महीने की सजा भी काटी। वेकरपात्री महाराजकी राजनीतिक डालराम राज्य परिषदके अध्यक्ष भी थे। १९५० में वे दंडी संन्यासी बनाये गए और १९८१ में शंकराचार्य की उपाधि मिली। १९५० में ज्योतिष्पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से दण्ड-सन्यास की दीक्षा ली और स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती नाम से जाने जाने लगे।
आज वः उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री हे।
 

१९ ०७ २०१७ में द्वारका सारदा मठ में भगवान्
श्री द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री: स्वरूपानन्द सरस्वतीजी महाराज के पास गुरुमंत्र लिया और दीक्षा ली यह मेरे जीवन का सबसे श्रेष्ठ समय था

जगतगुरु संकराचार्य के चार पीठ और उसकी महत्वता *विशाल राजेंद्र जोषी*

चार मठ निम्नलिखित हैं:
*.उत्तरामण्य मठ या उत्तर मठ,ज्योतिर्मठ जो कि जोशीमठमें स्थित है।

*.पूर्वामण्य मठ या पूर्वी मठ,गोवर्धन मठ जो कि पुरीमें स्थित है।

*.दक्षिणामण्य मठ या दक्षिणी मठ,शृंगेरी शारदा पीठजो कि शृंगेरीमें स्थित है।

*.पश्चिमामण्य मठ या पश्चिमी मठ,द्वारिका पीठ जो कि द्वारिका में स्थित है।

इन चार मठों के अतिरिक्त भी भारतमें कई अन्य जगह शंकराचार्य पद लगाने वाले मठ मिलते हैं। यह इस प्रकार हुआ कि कुछ शंकराचार्यों के शिष्यों ने अपने मठ स्थापित कर लिये एवं अपने नाम के आगे भी शंकराचार्य उपाधि लगाने लगे। परन्तु असली शंकराचार्य उपरोक्त चारों मठोंपर आसीन को ही माना जाता है।

.आदि शंकराचार्य ने मुख्य चार ही मठो की स्थापना की थी .
ज्योतिर्मठ
*.गोवर्धन मठ
*.शृंगेरी शारदा पीठ
*.द्वारिका पीठ

हेतु केवल इतना ही की कोई भी हिन्दू को सनातन धर्म का कोई भी प्रश्न हो तो उसका उतार पूरी संतुस्था के साथ मिल सके और लोग अंध श्रद्धा में न फसे

भारत में हिन्दू संप्रदाय की सबसे उची पदवी यानी के भगवन श्री संकराचार्य

संकराचार्य को वेद उपनिषद् एवम् सनातन धर्म का हर इक ग्रन्थ कंठस्त होना चाहिए और सभी सास्त्रो का पठन एवम् सास्त्र का ज्ञान होना चाहिए तब वः जगतगुरु कहलाते हे

                                
परम पूज्यपाद अनंतश्रीविभूषित
उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारकाशारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामीश्री: स्वरूपानन्द सरस्वतीजी महाराज
का शिष्य  "विशाल राजेंद्र जोषी"

Wednesday, 5 July 2017

ॐ त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर महिमा विशाल जोशी

ॐ त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं
जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 देवताआं के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है
जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं ।
साथ ही वह नीरोग, ऐश्व‍र्य युक्ता धनवान भी होता है ।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है । भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
• त्रि - ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
• यम - अध्ववरसु प्राण का घोतक है, जो मुख में स्थित है।
• ब - सोम वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
• कम - जल वसु देवता का घोतक है, जो वाम कर्ण में स्थित है।
• य - वायु वसु का घोतक है, जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
• जा- अग्नि वसु का घोतक है, जो बाम बाहु में स्थित है।
• म - प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
• हे - प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
• सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
• ग -शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
• न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
• पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
• ष्टि - अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है, बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
• व - पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
• र्ध - भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है, बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
• नम् - कपाली रुद्र का घोतक है । उरु मूल में स्थित है।
• उ- दिक्पति रुद्र का घोतक है । यक्ष जानु में स्थित है।
• र्वा - स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
• रु - भर्ग रुद्र का घोतक है, जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
• क - धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
• मि - अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
• व - मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
• ब - वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
• न्धा - अंशु आदित्यद का घोतक है । वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
• नात् - भगादित्यअ का बोधक है । वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
• मृ - विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
• र्त्यो् - दन्दाददित्य् का बोधक है । वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
• मु - पूषादित्यं का बोधक है । पृष्ठै भगा में स्थित है ।
• क्षी - पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है । नाभि स्थिल में स्थित है।
• य- त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है । गुहय भाग में स्थित है।
• मां - विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
• मृ - प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
• तात्- अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।
उपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्त देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं । जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग - अंग ( जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं ) उनकी रक्षा होती है ।
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Saturday, 10 June 2017

विशुद्ध वैदिक धर्म का जातिगत परिप्रेक्ष में यथार्थ स्वरूप - हर व्यक्ति के लिए उपयोगी हे विशाल जोषी

१- ब्राह्मण + ब्राह्मणी = ब्राह्मण । [-विशुद्ध वर्ण ]
__________________________

ब्राह्मण + क्षत्रिया = मूर्धावसिक्त (*)

ब्राह्मण + वैश्या = अम्बष्ठ (*)

ब्राह्मण + शूद्रा = पारशव निषाद (*)

२- क्षत्रिय + क्षत्रिया = क्षत्रिय । [ -विशुद्ध वर्ण ]
________________________

क्षत्रिय + ब्राह्मणी = सूत । (#)

क्षत्रिय + वैश्या = माहिष्य। (*)

क्षत्रिय + शूद्रा = म्लेच्छ / उग्र । (*)

३- वैश्य + वैश्या = वैश्य । [-विशुद्ध वर्ण ]
________________________

वैश्य + ब्राह्मणी = वैदेहक (#)

वैश्य + क्षत्रिया = मागध (#)

वैश्य + शूद्रा = करण (*)

४- शूद्र + शूद्रा = शूद्र । [- विशुद्ध वर्ण ]
_______________________

शूद्र + ब्राह्मणी = चांडाल । (#)

शूद्र + क्षत्रिया = क्षत्ता। (#)

शूद्र + वैश्या = अयोगव। (#)

ध्यातव्य - १- माहिष्य (पुरुष ) + करणी (स्त्री) = रथकार (संकीर्ण संकर ) ।

२- (*) = अनुलोम संकर।

३- (#) = प्रतिलोम संकर ।

[-साभार : मनुस्मृति , याज्ञवल्क्य स्मृति , गरुड़ पुराण आदि । ]
विशाल राजेंद्र भाई जोषी संकलन

Friday, 2 June 2017

यज्ञ की सच्ची जानकारी यज्ञ क्या हे। विशाल राजेंद जोषी नखत्राणा कच्छ

यज्ञ दो प्रकार के होते है- श्रौत और स्मार्त। श्रुति पति पादित यज्ञो को श्रौत यज्ञ और स्मृति प्रतिपादित यज्ञो को स्मार्त यज्ञ कहते है। श्रौत यज्ञ में केवल श्रुति प्रतिपादित मंत्रो का प्रयोग होता है और स्मार्त यज्ञ में वैदिक पौराणिक और तांत्रिक मंन्त्रों का प्रयोग होता है। वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है। किन्तु उनमें पांच यज्ञ ही प्रधान माने गये हैं - 1. अग्नि होत्रम, 2. दर्शपूर्ण मासौ, 3. चातुर्म स्यानि, 4. पशुयांग, 5. सोमयज्ञ, ये पाॅंच प्रकार के यज्ञ कहे गये है, यह श्रुति प्रतिपादित है। वेदों में श्रौत यज्ञों की अत्यन्त महिमा वर्णित है। श्रौत यज्ञों को श्रेष्ठतम कर्म कहा है कुल श्रौत यज्ञो को १९ प्रकार से विभक्त कर उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
1. स्मार्त यज्ञः-
विवाह के अनन्तर विधिपूर्वक अग्नि का स्थापन करके जिस अग्नि में प्रातः सायं नित्य हनादि कृत्य किये जाते है। उसे स्मार्ताग्नि कहते है। गृहस्थ को स्मार्ताग्नि में पका भोजन प्रतिदिन करना चाहिये।
2. श्रोताधान यज्ञः-
दक्षिणाग्नि विधिपूर्वक स्थापना को श्रौताधान कहते है। पितृ संबंधी कार्य होते है।
3. दर्शभूर्णमास यज्ञः-
अमावस्या और पूर्णिमा को होने वाले यज्ञ को दर्श और पौर्णमास कहते है। इस यज्ञ का अधिकार सपत्नीक होता है। इस यज्ञ का अनुष्ठान आजीवन करना चाहिए यदि कोई जीवन भर करने में असमर्थ है तो 30 वर्ष तक तो करना चाहिए।
4. चातुर्मास्य यज्ञः-
चार-चार महीने पर किये जाने वाले यज्ञ को चातुर्मास्य यज्ञ कहते है इन चारों महीनों को मिलाकर चतुर्मास यज्ञ होता है।
5. पशु यज्ञः-
प्रति वर्ष वर्षा ऋतु में या दक्षिणायन या उतरायण में संक्रान्ति के दिन एक बार जो पशु याग किया जाता है। उसे निरूढ पशु याग कहते है।
6. आग्रजणष्टि (नवान्न यज्ञ) :-
प्रति वर्ष वसन्त और शरद ऋतुओं नवीन अन्न से यज्ञ गेहूॅं, चावल से जा यज्ञ किया जाता है उसे नवान्न कहते है।
7. सौतामणी यज्ञ (पशुयज्ञ) :-
इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है सौतामणी यज्ञ इन्द्र संबन्धी पशुयज्ञ है यह यज्ञ दो प्रकार का है। एक वह पांच दिन में पुरा होता है। सौतामणी यज्ञ में गोदुग्ध के साथ सुरा (मद्य) का भी प्रयोग है। किन्तु कलियुग में वज्र्य है। दूसरा पशुयाग कहा जाता है। क्योकि इसमें पांच अथवा तीन पशुओं की बली दी जाती है।
8. सोम यज्ञः-
सोमलता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है उसे सोम यज्ञ कहते है। यह वसन्त में होता है यह यज्ञ एक ही दिन में पूर्ण होता है। इस यज्ञ में 16 ऋत्विक ब्राह्मण होते है।
9. वाजपये यज्ञः-
इस यज्ञ के आदि और अन्त में वृहस्पति नामक सोम यग अथवा अग्निष्टोम यज्ञ होता है यह यज्ञ शरद रितु में होता है।
10. राजसूय यज्ञः-
राजसूय या करने के बाद क्षत्रिय राजा समाज चक्रवर्ती उपाधि को धारण करता है।
11. अश्वमेघ यज्ञ:-
इस यज्ञ में दिग्विजय के लिए (घोडा) छोडा जाता है। यह यज्ञ दो वर्ष से भी अधिक समय में समाप्त होता है। इस यज्ञ का अधिकार सार्वभौम चक्रवर्ती राजा को ही होता है।
12. पुरूष मेघयज्ञ:-
इस यज्ञ समाप्ति चालीस दिनों में होती है। इस यज्ञ को करने के बाद यज्ञकर्ता गृह त्यागपूर्वक वान प्रस्थाश्रम में प्रवेश कर सकता है।
13. सर्वमेघ यज्ञ:-
इस यज्ञ में सभी प्रकार के अन्नों और वनस्पतियों का हवन होता है। यह यज्ञ चैंतीस दिनों में समाप्त होता है।
14. एकाह यज्ञ:-
एक दिन में होने वाले यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते है। इस यज्ञ में एक यज्ञवान और सौलह विद्वान होते है।
15. रूद्र यज्ञ:-
यह तीन प्रकार का होता हैं रूद्र महारूद्र और अतिरूद्र रूद्र यज्ञ 5-7-9 दिन में होता हैं महारूद्र 9-11 दिन में होता हैं। अतिरूद्र 9-11 दिन में होता है। रूद्रयाग में 16 अथवा 21 विद्वान होते है। महारूद्र में 31 अथवा 41 विद्वान होते है। अतिरूद्र याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। रूद्रयाग में हवन सामग्री 11 मन, महारूद्र में 21 मन अतिरूद्र में 70 मन हवन सामग्र्री लगती है।
16. विष्णु यज्ञ:-
यह यज्ञ तीन प्रकार का होता है। विष्णु यज्ञ, महाविष्णु यज्ञ, अति विष्णु योग- विष्णु योग में 5-7-8 अथवा 9 दिन में होता है। विष्णु याग 9 दिन में अतिविष्णु 9 दिन में अथवा 11 दिन में होता हैं विष्णु याग में 16 अथवा 41 विद्वान होते है। अति विष्णु याग में 61 अथवा 71 विद्वान होते है। विष्णु याग में हवन सामग्री 11 मन महाविष्णु याग में 21 मन अतिविष्णु याग में 55 मन लगती है।
17. हरिहर यज्ञ:-
हरिहर महायज्ञ में हरि (विष्णु) और हर (शिव) इन दोनों का यज्ञ होता है। हरिहर यज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान होते है। हरिहर याग में हवन सामग्री 25 मन लगती हैं। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में होता है।
18. शिव शक्ति महायज्ञ:-
शिवशक्ति महायज्ञ में शिव और शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और श शक्ति (दुर्गा) इन दोनों का यज्ञ होता है। शिव यज्ञ प्रातः काल और मध्याहन में होता है। इस यज्ञ में हवन सामग्री 15 मन लगती है। 21 विद्वान होते है। यह महायज्ञ 9 दिन अथवा 11 दिन में सुसम्पन्न होता है।
19. राम यज्ञ:-
राम यज्ञ विष्णु यज्ञ की तरह होता है। रामजी की आहुति होती है। रामयज्ञ में 16 अथवा 21 विद्वान हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है।
20. गणेश यज्ञ:-
गणेश यज्ञ में एक लाख (100000) आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। गणेशयज्ञ में हवन सामग्री 21 मन लगती है। यह यज्ञ 8 दिन में होता है।
21. ब्रह्म यज्ञ (प्रजापति यज्ञ):-
प्रजापत्ति याग में एक लाख (100000) आहुति होती हैं इसमें 16 अथवा 21 विद्वान होते है। प्रजापति यज्ञ में 12 मन सामग्री लगती है। 8 दिन में होता है।
22. सूर्य यज्ञ:-
सूर्य यज्ञ में एक करोड़ 10000000 आहुति होती है। 16 अथवा 21 विद्वान होते है। सूर्य यज्ञ 8 अथवा 21 दिन में किया जाता है। इस यज्ञ में 12 मन हवन सामग्री लगती है।
23. दूर्गा यज्ञ:-
दूर्गा यज्ञ में दूर्गासप्त शती से हवन होता है। दूर्गा यज्ञ में हवन करने वाले 4 विद्वान होते है। अथवा 16 या 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 9 दिन का होता है। हवन सामग्री 10 मन अथवा 15 मन लगती है।
24. लक्ष्मी यज्ञ:-
लक्ष्मी यज्ञ में श्री सुक्त से हवन होता है। लक्ष्मी यज्ञ (100000) एक लाख आहुति होती है। इस यज्ञ में 11 अथवा 16 विद्वान होते है। या 21 विद्वान 8 दिन में किया जाता है। 15 मन हवन सामग्री लगती है।
25. लक्ष्मी नारायण महायज्ञ:-
लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में लक्ष्मी और नारायण का ज्ञन होता हैं प्रात लक्ष्मी दोपहर नारायण का यज्ञ होता है। एक लाख 8 हजार अथ्वा 1 लाख 25 हजार आहुतियां होती है। 30 मन हवन सामग्री लगती है। 31 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 दिन 9 दिन अथवा 11 दिन में पूरा होता है।
26. नवग्रह महायज्ञ:-
नवग्रह महायज्ञ में नव ग्रह और नव ग्रह के अधिदेवता तथा प्रत्याधि देवता के निर्मित आहुति होती हैं नव ग्रह महायज्ञ में एक करोड़ आहुति अथवा एक लाख अथवा दस हजार आहुति होती है। 31, 41 विद्वान होते है। हवन सामग्री 11 मन लगती है। कोटिमात्मक नव ग्रह महायज्ञ में हवन सामग्री अधिक लगती हैं यह यज्ञ ९ दिन में होता हैं इसमें 1,5,9 और 100 कुण्ड होते है। नवग्रह महायज्ञ में नवग्रह के आकार के 9 कुण्डों के बनाने का अधिकार है।
27. विश्वशांति महायज्ञ:-
विश्वशांति महायज्ञ में शुक्लयजुर्वेद के 36 वे अध्याय के सम्पूर्ण मंत्रों से आहुति होती है। विश्वशांति महायज्ञ में सवा लाख (123000) आहुति होती हैं इस में 21 अथवा 31 विद्वान होते है। इसमें हवन सामग्री 15 मन लगती है। यह यज्ञ 9 दिन अथवा 4 दिन में होता है।
28. पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ):-
पर्जन्य यज्ञ (इन्द्र यज्ञ) वर्षा के लिए किया जाता है। इन्द्र यज्ञ में तीन लाख बीस हजार (320000) आहुति होती हैं अथवा एक लाख 60 हजार (160000) आहुति होती है। 31 मन हवन सामग्री लगती है। इस में 31 विद्वान हवन करने वाले होते है। इन्द्रयाग 11 दिन में सुसम्पन्न होता है।
29. अतिवृष्टि रोकने के लिए यज्ञ:-
अनेक गुप्त मंत्रों से जल में 108 वार आहुति देने से घोर वर्षा बन्द हो जाती है।
30. गोयज्ञ:-
वेदादि शास्त्रों में गोयज्ञ लिखे है। वैदिक काल में बडे-बडे़ गोयज्ञ हुआ करते थे। भगवान श्री कृष्ण ने भी गोवर्धन पूजन के समय गौयज्ञ कराया था। गोयज्ञ में वे वेदोक्त दोष गौ सूक्तों से गोरक्षार्थ हवन गौ पूजन वृषभ पूजन आदि कार्य किये जाते है। जिस से गौसंरक्षण गौ संवर्धन, गौवंशरक्षण, गौवंशवर्धन गौमहत्व प्रख्यापन और गौसड्गतिकरण आदि में लाभ मिलता हैं गौयज्ञ में ऋग्वेद के मंत्रों द्वारा हवन होता है। इस में सवा लाख 250000 आहुति होती हैं गौयाग में हवन करने वाले 21 विद्वान होते है। यह यज्ञ 8 अथवा 9 दिन में सुसम्पन्न होता है।